Chitrakote Waterfall: चित्रकोट में ‘नाइट टूरिज्म’ का सपना चकनाचूर; ₹10 करोड़ का लेजर लाइट प्रोजेक्ट कबाड़ में तब्दील, उपकरण भी हुए गायब
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में स्थित विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात में 10 करोड़ रुपये की लागत से लगा लेजर लाइट प्रोजेक्ट वर्षों बाद भी शुरू नहीं हुआ। उपकरण चोरी होने के बाद उठे सवाल, विधायक ने जताई नाराजगी।
जगदलपुर. छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्थित विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात (Chitrakote Waterfall) में ‘नाइट टूरिज्म’ (रात्रि पर्यटन) को एक नई और भव्य पहचान देने का सपना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। देश-दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए लगभग 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से स्थापित किया गया लेजर लाइट प्रोजेक्ट वर्षों बाद भी शुरू नहीं हो सका है। दो से तीन बार केवल परीक्षण (ट्रायल) किए जाने के बाद यह महत्वाकांक्षी परियोजना आज तक नियमित रूप से चालू नहीं हो पाई, जिससे स्थानीय स्तर पर भारी निराशा है।
न उद्घाटन हुआ, न हैंडओवर; देखरेख के बिना कबाड़ बन गई योजना
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस हाई-टेक लेजर लाइट सिस्टम को लगाने वाले ठेकेदार ने इसे आज तक किसी भी सरकारी विभाग को आधिकारिक रूप से हैंडओवर (सुपुर्द) ही नहीं किया। लापरवाही का आलम यह है कि उचित रख-रखाव और सुरक्षा के अभाव में साइट पर लगी कई महंगी लाइटें और कीमती उपकरण अब गायब हो चुके हैं। लेजर शो के संचालन में इस्तेमाल होने वाली बैटरियां भी अपनी जगह से नदारद हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इस बहुप्रतीक्षित परियोजना का कभी औपचारिक उद्घाटन तक नसीब नहीं हुआ।
विधायक विनायक गोयल ने जताई नाराजगी, जांच की मांग
चित्रकोट जलप्रपात में सरकारी पैसों की इस तरह बर्बादी पर स्थानीय चित्रकोट विधायक विनायक गोयल ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग के आला अधिकारियों से विस्तृत जानकारी तलब करने और स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कराने की बात कही है।
पर्यटकों का दर्द: आज चित्रकोट पहुंचने वाले सैलानियों के स्वागत में केवल लोहे के ऊंचे पोल ही खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन उन पर कभी रोशनी नहीं जलती। पर्यटकों का कहना है कि यदि यह लेजर शो और साउंड सिस्टम नियमित रूप से शुरू हो जाए, तो भारत के ‘नियाग्रा फॉल’ कहे जाने वाले चित्रकोट की खूबसूरती रात के वक्त भी दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर खींच सकती है।
सरकारी संसाधनों की बर्बादी से स्थानीय लोगों में आक्रोश
इस करोड़ों के प्रोजेक्ट के ठप पड़े रहने से स्थानीय ग्रामीणों और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों में खासा आक्रोश है। उनका मानना है कि यदि यह योजना धरातल पर उतरती, तो बस्तर में रोजगार के नए अवसर पैदा होते। आज करोड़ों रुपये की यह परियोजना प्रशासनिक उदासीनता और ठेकेदार की मनमानी के कारण अंधेरे में डूबी हुई है, जो सीधे तौर पर जनता के टैक्स और सरकारी संसाधनों की खुली बर्बादी है।




