होर्मुज तनाव से वैश्विक तेल बाजार में हलचल, क्रूड 79 डॉलर के पार, भारत पर भी पड़ सकता है असर
मिडिल ईस्ट में बढ़ते अमेरिका-ईरान तनाव के बीच क्रूड ऑयल की कीमत 79 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ी अनिश्चितता से वैश्विक तेल बाजार में हलचल है, जिसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

नई दिल्ली. मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया और ब्रेंट क्रूड 79 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया। बाजार में यह तेजी ऐसे समय आई है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो तेल आयात पर निर्भर देशों, खासकर भारत के लिए ईंधन लागत बढ़ने की संभावना बन सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
मिडिल ईस्ट में हालिया घटनाक्रम के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक बाजारों की सबसे बड़ी चिंता बन गया है। एक वाणिज्यिक जहाज पर हमले के बाद क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। इसके बाद ईरान ने होर्मुज के संचालन को लेकर कड़ा रुख अपनाया, जबकि अमेरिका ने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर जहाजों की आवाजाही जारी है और समुद्री मार्ग सुरक्षित बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। दोनों देशों के अलग-अलग दावों के कारण ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
ब्रेंट और WTI दोनों में तेज बढ़त
बाजार में जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई दोनों पर देखने को मिला। ब्रेंट क्रूड 79 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि डब्ल्यूटीआई भी 74 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया। इसके साथ ही यूरोपीय प्राकृतिक गैस वायदा कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे ऊर्जा बाजार में व्यापक दबाव का संकेत मिला।
वैश्विक आपूर्ति पर मंडराया जोखिम
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संभालता है। ऐसे में इस मार्ग पर किसी भी प्रकार की बाधा वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है। हालिया घटनाओं के बाद इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में कमी की खबरें भी सामने आई हैं। हालांकि, वैकल्पिक समुद्री मार्गों के जरिए आपूर्ति बनाए रखने के प्रयास जारी हैं, लेकिन बाजार अभी भी संभावित व्यवधान को लेकर सतर्क बना हुआ है।
समझौते के बावजूद नहीं थमा तनाव
कुछ समय पहले दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने उस प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया सैन्य कार्रवाई और तीखे बयानबाजी के बाद क्षेत्र में स्थिरता को लेकर अनिश्चितता फिर बढ़ गई है। इससे निवेशकों की चिंता भी बढ़ी है और तेल बाजार में तेजी का माहौल बना हुआ है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी बनी रहने पर आयात लागत बढ़ सकती है। इसका असर पेट्रोल, डीजल और परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता लंबे समय तक जारी रहती है, तो घरेलू ईंधन कीमतों और महंगाई पर भी इसका दबाव बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।




