उत्तर प्रदेशराज्य

किरायेदारी विवाद में SC/ST एक्ट नहीं लगेगा, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की चार्जशीट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किरायेदारी से जुड़े दीवानी विवाद में SC/ST एक्ट के इस्तेमाल को लेकर अहम फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि केवल दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देकर मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।

प्रयागराज. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मूल रूप से दीवानी प्रकृति के विवादों को आपराधिक मुकदमे का रूप देकर किसी पक्ष पर दबाव बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत रंजिश निकालने या किसी को प्रताड़ित करने के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किरायेदारी विवाद को आधार बनाकर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज करना हर स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता।

SC/ST एक्ट लागू होने के लिए जरूरी शर्तों पर अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत अपराध तभी बनता है, जब कथित घटना सार्वजनिक दृष्टि में हुई हो और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति का उसकी जाति के आधार पर अपमान करना हो। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में प्रथम दृष्टया ऐसे आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो रहे थे। इसी आधार पर विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश और चार्जशीट को रद्द कर दिया गया।

क्या था बुलंदशहर का मामला

मामला बुलंदशहर जिले के खुर्जा क्षेत्र का है, जहां आर्य समाज मंदिर परिसर स्थित एक दुकान को लेकर विवाद सामने आया था। शिकायतकर्ता दुकान का किरायेदार था, जबकि अपीलकर्ता मंदिर के कैशियर के रूप में कार्यरत था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि मार्च 2023 में विवाद के दौरान मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी की गई। हालांकि घटना के एक वर्ष से अधिक समय बाद एफआईआर दर्ज हुई। पुलिस जांच के बाद केवल एक आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, जिसके आधार पर विशेष अदालत ने समन जारी किया था। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

एफआईआर में देरी और दीवानी विवाद बना अहम आधार

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि मामला लंबे समय से किरायेदारी विवाद से जुड़ा था और इसी रंजिश के कारण आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया। अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि एफआईआर दर्ज होने में हुई लंबी देरी का संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया। साथ ही दोनों पक्षों के बीच पहले से चल रहे दीवानी विवाद को भी महत्वपूर्ण माना गया।

कानून के दुरुपयोग पर अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्य दीवानी या किरायेदारी विवाद को जातीय अपमान का रूप देकर आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है। अदालत ने माना कि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही का उद्देश्य मूल विवाद में दबाव बनाना प्रतीत होता है। इसी निष्कर्ष के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश और चार्जशीट को निरस्त कर दिया।

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