राजनीतिक

FCRA बिल 2026: चौतरफा विरोध के बीच JPC को भेजने की तैयारी, क्या झुकेगी सरकार?

विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक 2026 को लेकर संसद में गतिरोध बना हुआ है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों के कड़े विरोध के बीच केंद्र सरकार FCRA बिल को विस्तृत समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति को भेजने पर विचार कर रही है। हालांकि विपक्षी खेमा इस विधेयक को पूरी तरह खारिज करते हुए वापस लेने पर अड़ा है। NDA की महत्वपूर्ण बैठक के बाद संसदीय कार्यप्रणाली को सुचारू बनाने के प्रयास तेज हो गए हैं।

केंद्रीय नेतृत्व ने हाल ही में आयोजित ‘मंगल मिलन’ संसदीय दल की बैठक में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। इस उच्च स्तरीय बैठक में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, जितेंद्र सिंह और अर्जुन राम मेघवाल समेत सत्ता पक्ष के प्रमुख चेहरे मौजूद रहे। इसी बीच केंद्र सरकार विवादित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को संसद में सीधा पारित कराने के बजाय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का विकल्प तलाश रही है। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की ताजा बैठक की कार्यसूची में FCRA बिल और परिसीमन विधेयक दोनों को ही शामिल नहीं किया गया, जिससे सरकार के बैकफुट पर आने के संकेत मिले हैं।

विपक्षी दलों के विरोध और संसद के गतिरोध पर पहल

विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की तरफ से आए तीखे बयानों के बाद केंद्र ने JPC के माध्यम से समीक्षा का रुख अपनाया है। संसद में बने लंबे गतिरोध को समाप्त करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री के साथ चर्चा के उपरांत संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की है। सरकार की कोशिश है कि गतिरोध दूर कर सदन का संचालन सुचारू किया जा सके। हालांकि, विरोधी खेमा विधेयक को JPC के पास भेजने के प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं है और इसे पूरी तरह रद्द कराने की मांग पर टिका हुआ है।

क्या है FCRA संशोधन विधेयक 2026 और विवाद?

यह संशोधन विधेयक 25 मार्च 2026 को पहली बार लोकसभा के पटल पर रखा गया था। इसके आते ही सामाजिक संगठनों और विभिन्न हितधारकों ने कड़ा ऐतराज जताया, जिसके चलते प्रक्रिया को रोकना पड़ा। मुख्य विवाद विदेशी धन प्राप्त करने के नियमों को अत्यधिक सख्त बनाने और मौजूदा कानून की धारा 15 को समाप्त करने की मांग से जुड़ा हुआ है।

DMK, NCP और ईसाई संगठनों का कड़ा रुख

इस कानून का विरोध केवल पारंपरिक विपक्षी दलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सरकार के रणनीतिक सहयोगियों और प्रमुख सामाजिक निकायों ने भी सवाल उठाए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के निर्देश पर डीएमके प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री से भेंट कर इस बिल को तुरंत वापस लेने और धारा 15 निरस्त करने का आग्रह किया है। चूंकि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मामलों में द्रमुक का रुख मायने रखता है, इसलिए सरकार के लिए उनकी राय अहम है।

दूसरी ओर एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की ओर से सुप्रिया सुले ने तर्क दिया है कि हर विदेशी सहायता को संदेह से देखना उचित नहीं है और इसे JPC को भेजा जाना चाहिए। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा तथा कई प्रमुख ईसाई संस्थाओं ने भी विधेयक को पुनर्विचार हेतु संसदीय समिति के पास सुपुर्द करने का आग्रह किया है।

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