7/11 मुंबई ट्रेन धमाका केस: ATS की जांच पर अदालत की कड़ी टिप्पणी, आरोपियों की रिहाई कायम
मुंबई 7/11 ट्रेन ब्लास्ट मामले में हाईकोर्ट ने ATS की जांच पर गंभीर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार करते हुए फैसले को बरकरार रखा।
मुंबई. साल 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में एक अहम कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) की जांच के आधार पर 28 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से 13 को गिरफ्तार किया गया। हालांकि जुलाई 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 667 पन्नों के विस्तृत फैसले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। इस निर्णय को चुनौती देते हुए महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी आरोपियों की रिहाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने केवल इतना स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले को फिलहाल किसी अन्य मामले में कानूनी मिसाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
मकोका कोर्ट से हाईकोर्ट तक बदला पूरा मामला
इस फैसले से पहले सितंबर 2015 में विशेष मकोका अदालत ने मामले में 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इनमें पांच को फांसी और सात को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जबकि एक आरोपी को बरी किया गया था। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने मौत की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जबकि दोषियों ने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की। लंबी सुनवाई के बाद जुलाई 2025 में हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस दौरान एक आरोपी की जेल में महामारी के समय मृत्यु भी हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ATS की जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। न्यायालय ने 11 आरोपियों के लगभग समान इकबालिया बयानों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए और माना कि इन बयानों से पहले हिरासत में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के आरोपों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि कठोर आतंकवाद विरोधी कानून लागू करने के लिए आवश्यक पूर्व स्वीकृति के समर्थन में पर्याप्त और भरोसेमंद सामग्री उपलब्ध नहीं थी।
अदालत की सख्त टिप्पणी से बढ़ी बहस
फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आरोपियों को कटघरे में खड़ा कर किसी मामले के समाधान का आभास देना न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए नुकसानदायक है। अदालत के अनुसार, इस तरह की जांच लोगों के न्याय व्यवस्था पर भरोसे को कमजोर करती है और वास्तविक दोषियों तक पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। इन टिप्पणियों के बाद जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच प्रक्रिया पर नई बहस शुरू हो गई है।
इंडियन मुजाहिद्दीन थ्योरी ने भी बढ़ाए सवाल
मामले की जांच पर सवाल पहली बार 2008 में तब उठे थे, जब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इंडियन मुजाहिद्दीन से जुड़े सादिक शेख को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने दावा किया था कि 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों में इंडियन मुजाहिद्दीन की भूमिका थी। बाद में 2013 में गिरफ्तार संगठन के सह-संस्थापक यासीन भटकल ने भी इसी तरह का दावा किया था। इसके बावजूद तत्कालीन ATS नेतृत्व ने इस थ्योरी को पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में स्वीकार नहीं किया और अपनी मूल जांच पर कायम रहा। अब हाईकोर्ट की टिप्पणियों और सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित आतंकी मामलों में एक बार फिर चर्चा का केंद्र बन गया है।




