मिशन 850 लोकसभा सीट: दो-तिहाई का आंकड़ा और जनगणना का पेंच, क्या पार पा पाएगी NDA?
क्या एनडीए सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कर पाएगी? जानिए संसद के गणित, अनुच्छेद 81 की संवैधानिक अड़चनों और 2011 की जनगणना के इस पूरे पेंच को।
नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार आगामी मॉनसून सत्र में दो बड़े ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी में है। सरकार महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए नया संविधान संशोधन और लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) ला सकती है। लेकिन इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाना और जनगणना से जुड़ी संवैधानिक अड़चनें हैं। पिछले बजट सत्र में संख्या बल की कमी से 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर चुका है, इसलिए इस बार सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
संसद का गणित: दो-तिहाई बहुमत से कितनी दूर है NDA?
संविधान संशोधन को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी है।
- लोकसभा का समीकरण: 543 सीटों वाली लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों की जरूरत होती है। पाला बदलने वाले सांसदों को मिलाकर भी एनडीए के पास फिलहाल 319 सांसद ही हैं (जिसमें TMC के 20 और शिवसेना UBT के 6 सांसद शामिल हैं)। सरकार को अब भी 41 और सीटों की दरकार है।
- राज्यसभा का समीकरण: यहाँ बहुमत के लिए 161 सांसदों की जरूरत है, जबकि NDA की मौजूदा ताकत 152 है। यानी 9 सांसदों की कमी है। इस कमी को पाटने के लिए सरकार को विपक्ष का साथ चाहिए या फिर वोटिंग के वक्त वॉकआउट का सहारा लेना होगा।
तमिलनाडु और क्षेत्रीय दलों की चिंता
दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु की डीएमके (DMK) का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम करने वाले दक्षिणी राज्यों की सीटें उत्तर भारत के मुकाबले कम नहीं होनी चाहिए। हालांकि, तमिलनाडु में टीवीके (TVK) के उभार के बाद डीएमके के रुख में थोड़ी नरमी के संकेत मिले हैं, लेकिन उनके सांसद तिरुची शिवा का कहना है कि आधिकारिक प्रस्ताव आने से पहले कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
अनुच्छेद 81 के दो नियम और जनगणना का पेच
इस पूरे विवाद की जड़ में संविधान के अनुच्छेद 81 के दो कड़े नियम हैं:
- अंतर-राज्यीय सीटों का आवंटन (अनुच्छेद 81(2)(a)): इसके तहत राज्यों को आबादी के अनुपात में सीटें मिलती हैं। फिलहाल देश में 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें फ्रीज हैं (पहला फ्रीज 1976 और दूसरा 2001 में हुआ था)। इसकी मियाद 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के बाद खत्म हो जाएगी।
- 2011 की जनगणना का पेंच: अगर सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाती है, तो यूपी-बिहार जैसे राज्यों की सीटें केरल-तमिलनाडु की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी क्योंकि उत्तर भारत की आबादी तेजी से बढ़ी है। सरकार इस विरोध को शांत करने के लिए फ्रीज की समयसीमा को कुछ और दशकों के लिए आगे बढ़ा सकती है।
राज्य के भीतर परिसीमन पर बन सकती है बात
अनुच्छेद 81 का दूसरा नियम राज्य के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करता है, जिसके लिए अभी 2001 की जनगणना आधार है। सरकार नए बिल में इसे बदलकर 2011 की जनगणना पर आधारित करने का प्रस्ताव दे सकती है, जिस पर विपक्ष के भी सहमत होने की उम्मीद ज्यादा है।




