तिब्बत में चीन की ‘ट्विन स्ट्रैटेजी’ से भारत की टेंशन बढ़ी: सांस्कृतिक पहचान मिटाकर खड़ा किया जा रहा सैन्य ढांचा
तिब्बत में चीन की दोहरी रणनीति से भारत की चिंता बढ़ गई है। ड्रैगन एक तरफ तिब्बत की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को मिटाने में जुटा है, वहीं दूसरी ओर एलएसी के पास दोहरे उपयोग वाला सैन्य बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है। जानिए भारत की उत्तरी सीमाओं पर इसके क्या प्रभाव होंगे।
चीन तिब्बत में ‘ट्विन स्ट्रैटेजी’ (दोहरी रणनीति) के तहत बौद्ध सांस्कृतिक स्थलों को ध्वस्त कर उन्हें दोहरे उपयोग वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में बदल रहा है। भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य एलएसी पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाना और भारत पर रणनीतिक दबाव बनाना है।
तिब्बत में चीन की दोहरी रणनीति और भारत के लिए खतरे की घंटी
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति सामान्य दिखने के बावजूद बीजिंग अंदरखाने एक बड़ा रणनीतिक जाल बुन रहा है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन तिब्बत क्षेत्र में दोहरी रणनीति (ट्विन स्ट्रैटेजी) पर तेजी से काम कर रहा है। इस योजना के तहत एक ओर जहां तिब्बती बौद्ध धर्म और वहां की ऐतिहासिक पहचान को व्यवस्थित तरीके से समाप्त किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जा रहा है जिसका उपयोग नागरिक गतिविधियों के साथ-साथ सैन्य अभियानों के लिए भी हो सके।
धार्मिक स्थलों का विनाश और ‘रेड टूरिज्म’ का प्रसार
सीएनएन-न्यूज18 की रिपोर्ट और सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि पूर्वी तिब्बत के खाम क्षेत्र स्थित ड्रैगो काउंटी में एक पवित्र धार्मिक स्थल को ध्वस्त कर दिया गया है। 1973 के भूकंप के बाद स्थानीय समुदाय द्वारा स्थापित 99 फुट ऊंची बुद्ध मूर्ति के स्थान को कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार हेतु रेसकोर्स में तब्दील कर दिया गया है। स्थानीय निवासी इस प्रशासनिक हस्तक्षेप की तुलना ‘दूसरी सांस्कृतिक क्रांति’ से कर रहे हैं, जहां आस्था के प्रतीकों को हटाकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की महिमा का बखान किया जा रहा है।
नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर की आड़ में सैन्य सशक्तीकरण
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का आकलन है कि तिब्बत में जारी विकास परियोजनाएं केवल पर्यटन या स्थानीय सुधार तक सीमित नहीं हैं। खेल परिसरों, सड़कों और ग्रामीण बस्तियों के नाम पर तैयार किया जा रहा ढांचा दोहरे उपयोग की क्षमता से लैस है। किसी भी सीमावर्ती तनाव की स्थिति में इस इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग पीएलए के सैनिकों, भारी सैन्य उपकरणों और लॉजिस्टिक्स की त्वरित तैनाती के लिए किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, स्थानीय बच्चों को ‘लिबा’ नामक बॉर्डर मिलिशिया नेटवर्क में प्रशिक्षित कर सीमा का सैनिकीकरण किया जा रहा है।
जनसांख्यिकीय बदलाव और भाषाई पहचान का दमन
चीन सरकार तिब्बती पठार के सामरिक क्षेत्रों में हान चीनी आबादी के प्रवास को निरंतर बढ़ावा दे रही है ताकि मूल तिब्बती निवासियों का अनुपात कम किया जा सके। शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक व्यवस्था में मंदारिन (पुतोंगहुआ) भाषा को अनिवार्य कर तिब्बती भाषा, लिपि और धार्मिक अध्ययन को हाशिए पर धकेला जा रहा है। कूटनीतिक स्तर पर भी चीन ‘तिब्बत’ नाम के स्थान पर ‘शिजांग’ शब्द के इस्तेमाल को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय पहचान को कमजोर किया जा सके।
जल संसाधनों पर नियंत्रण और भारत पर रणनीतिक असर
तिब्बती पठार से ब्रह्मपुत्र, सिंधु और सतलुज जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम होता है, जो पूरे दक्षिण एशिया के लिए जीवनदायिनी हैं। तिब्बत में पारंपरिक समुदायों को विस्थापित कर बांध और ढांचागत तंत्र बनाने से चीन को निचले तटवर्ती देशों—विशेषकर भारत और बांग्लादेश—पर रणनीतिक बढ़त हासिल हो जाएगी। सांस्कृतिक समावेशन, जनसांख्यिकीय बदलाव और सैन्य बुनियादी ढांचे का यह एकीकृत मॉडल भारत की उत्तरी सीमाओं पर सुरक्षा माहौल को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।




