दिलजीत दोसांझ ने ‘सतलुज’ के लिए ली सिर्फ 1 रुपये फीस, फैसले ने जीता दिल
दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ के लिए केवल 1 रुपये की प्रतीकात्मक फीस स्वीकार की। निर्देशक के खुलासे के बाद अभिनेता के इस फैसले की व्यापक सराहना हो रही है।
अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ एक बार फिर अपने अलग अंदाज और संवेदनशील फैसले को लेकर चर्चा में हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सतलुज’ में मुख्य भूमिका निभाने के लिए उन्होंने पारंपरिक पारिश्रमिक लेने के बजाय केवल 1 रुपये की प्रतीकात्मक फीस स्वीकार की। बताया गया कि उनके लिए यह फिल्म एक व्यावसायिक परियोजना से अधिक सम्मान और जिम्मेदारी का विषय थी।
स्क्रिप्ट पढ़कर भावुक हुए थे दिलजीत
फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने बताया कि वर्ष 2021 में अमृतसर में जब उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट दिलजीत दोसांझ को सौंपी, तो अभिनेता उसे पढ़कर भावुक हो गए। उन्होंने स्क्रिप्ट को सम्मानपूर्वक अपने माथे से लगाया और तुरंत इस परियोजना का हिस्सा बनने की सहमति दे दी। निर्देशक के अनुसार, उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि दिलजीत इस किरदार को पूरी गंभीरता और समर्पण के साथ निभाना चाहते हैं।
प्रतीकात्मक फीस के पीछे रही औपचारिक वजह
निर्देशक ने यह भी बताया कि फिल्म के लिए तय की गई 1 रुपये की फीस केवल अनुबंध और कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के उद्देश्य से रखी गई थी। दिलजीत का मानना था कि इस तरह के ऐतिहासिक और प्रेरणादायक व्यक्तित्व को पर्दे पर जीवंत करना उनके लिए आर्थिक लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
सोशल मीडिया पर फैसले की हो रही सराहना
इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर दिलजीत दोसांझ के फैसले की व्यापक चर्चा हो रही है। प्रशंसकों और फिल्म प्रेमियों ने इसे कला के प्रति समर्पण, पेशेवर ईमानदारी और महान व्यक्तित्वों के प्रति सम्मान का उदाहरण बताया है। कई लोगों का मानना है कि यह कदम दर्शाता है कि कुछ फिल्में कलाकारों के लिए केवल अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी होती हैं।
समर्पण ने बनाई अलग पहचान
दिलजीत दोसांझ का यह निर्णय फिल्म उद्योग में उनकी अलग पहचान को और मजबूत करता है। अभिनय के साथ मूल्यों और संवेदनाओं को प्राथमिकता देने का उनका यह कदम दर्शकों के बीच सकारात्मक संदेश छोड़ता है और यह साबित करता है कि कुछ भूमिकाएं केवल करियर का हिस्सा नहीं, बल्कि सम्मान और प्रतिबद्धता का प्रतीक भी बन जाती हैं।




