लोकसभा स्पीकर के महाभियोग निर्णय को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने रखा फैसला सुरक्षित
जस्टिस यशवंत वर्मा महाभियोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। जांच समिति की वैधता पर सवाल, 12 जनवरी को संसदीय समिति के सामने जवाब।

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति को मंजूरी देने में प्रक्रियागत खामियों का आरोप लगाया है।
दो दिनों की सुनवाई के बाद जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने गुरुवार (8 जनवरी) को निर्णय सुरक्षित किया। हालांकि, बेंच ने जस्टिस वर्मा को पार्लियामेंट्री कमेटी के समक्ष जवाब दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने से इनकार कर दिया है। उन्हें 12 जनवरी को समिति के सामने जवाब देना है।
जांच समिति की वैधता को दी चुनौती
याचिका में जस्टिस वर्मा ने ओम बिरला द्वारा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित संसदीय जांच समिति की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने खारिज कर दिया था।
जस्टिस वर्मा के अनुसार, यदि एक ही दिन संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव दिया जाता है, तो जॉइंट कमेटी के गठन के लिए दोनों सदनों से प्रस्ताव का स्वीकार होना आवश्यक है। चूंकि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हुआ, इसलिए जजेज इन्क्वायरी एक्ट के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित समिति अस्थिर हो जाती है।
शीर्ष अदालत ने उठाए थे अहम सवाल
एक दिन पहले, बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा पर सवाल किया था कि यदि राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो जाए, जबकि उसी दिन लोकसभा में वह स्वीकार हो, तो क्या लोकसभा का प्रस्ताव स्वतः विफल माना जाएगा? अदालत ने इस विचार पर संदेह जताया कि लोकसभा द्वारा स्वीकार महाभियोग प्रस्ताव को केवल राज्यसभा में खारिज होने के आधार पर निरस्त माना जाए।
क्या है पूरा मामला?
पिछले वर्ष 14 मार्च 2025 को दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगी थी। आग बुझाने के दौरान दमकल विभाग को वहां से अधजले नोटों (नकदी) की बड़ी मात्रा मिली। इसके बाद उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इस घटनाक्रम के बाद उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया।
आंतरिक समिति की जांच और निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय आंतरिक समिति गठित की थी। जांच में यह पाया गया कि जस्टिस वर्मा का उस नकदी पर ‘नियंत्रण’ था और उन्हें कदाचार (misconduct) का दोषी ठहराया गया।
CJI की सिफारिश और महाभियोग प्रक्रिया
इसके बाद तत्कालीन संजीव खन्ना (CJI) ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग शुरू करने की सिफारिश की।
महाभियोग की प्रक्रिया जुलाई 2025 में शुरू हुई, जब लोकसभा के 140 से अधिक सांसदों ने प्रस्ताव पेश किया। 12 अगस्त 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति का गठन किया। वहीं राज्यसभा में 50 सांसदों ने भी इसी तरह का प्रस्ताव दिया था।
अब आगे क्या?
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
- 12 जनवरी को संसदीय समिति के सामने जस्टिस वर्मा का जवाब
- महाभियोग प्रक्रिया की दिशा पर फैसला निर्णायक




