कैजुअल सेक्स पर खुलकर बोले अर्जुन रामपाल, बयान ने मचाया सियासी-सामाजिक शोर
कैजुअल सेक्स के बाद क्यों महसूस होता है खालीपन? अर्जुन रामपाल की टिप्पणी और एक्सपर्ट्स की राय बता रही है फिजिकल रिश्तों के बाद की इमोशनल हकीकत।

मुंबई. एक वक्त था जब सेक्स का जिक्र भी समाज में फुसफुसाहट में होता था। आज बातचीत कहीं ज्यादा खुली और बेबाक है। कैजुअल सेक्स को मॉडर्न सोच, आत्मविश्वास और पर्सनल चॉइस का प्रतीक माना जाता है। साथ रहना या न रहना, हां कहना या मना करना—ये सभी फैसले व्यक्ति के निजी अधिकार हैं।
लेकिन इस खुली सोच के बीच एक सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है—उस एक पल के बाद क्या होता है, जब एक्साइटमेंट खत्म हो जाती है और इंसान अपने खाली कमरे में अकेला रह जाता है?
पॉडकास्ट की एक बात, जो सोचने पर मजबूर करती है
हाल ही में रणवीर इलाहाबादिया के पॉडकास्ट में अभिनेता अर्जुन रामपाल की एक टिप्पणी ने इसी अनकहे पहलू की ओर ध्यान खींचा। अर्जुन के मुताबिक, हम फिजिकल अट्रैक्शन को तो आसानी से समझ लेते हैं, लेकिन उस इमोशनल कीमत को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमारा मन चुपचाप चुकाता है।
कैजुअल सेक्स कई बार सिर्फ एक रात का अनुभव नहीं रहता—इसके बाद मेंटल स्ट्रेस, उलझन और एक अजीब-सा खालीपन सामने आ सकता है, जिसके लिए हम तैयार नहीं होते।
‘नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’ बनाम दिल-दिमाग का टकराव
अर्जुन का मानना है कि चाहे हम इसे कितना ही ‘कैजुअल’ क्यों न कह लें, जब दो लोग शारीरिक रूप से करीब आते हैं तो एनर्जी और फीलिंग्स शेयर होती ही हैं। ‘नो स्ट्रिंग्स अटैच्ड’ सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन असल जिंदगी में दिल और दिमाग को पूरी तरह अलग कर पाना आसान नहीं। रिश्ता अचानक खत्म होने पर कई लोग खुद को इमोशनली सुन्न या अकेला महसूस करने लगते हैं।
साइंस क्या कहता है?
इस मनोवैज्ञानिक उलझन को साइंस भी समझाता है। गेटवे ऑफ हीलिंग की फाउंडर और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत बताती हैं कि फिजिकल रिलेशन के दौरान दिमाग में ऑक्सिटोसिन और डोपामिन जैसे हार्मोन रिलीज होते हैं, जो जुड़ाव की भावना पैदा करते हैं।
शरीर कनेक्शन चाहता है, जबकि दिमाग खुद को समझाता रहता है कि यह सिर्फ कैजुअल है। यही टकराव कई बार सुबह उठते ही अकेलेपन या अचानक उदासी का कारण बनता है।
डॉक्टरों का अनुभव: पछतावा नहीं, फिर भी खालीपन
दिल्ली के सीके बिड़ला अस्पताल की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. त्रिप्ती राहेजा बताती हैं कि उन्होंने कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्हें अपने फैसले पर पछतावा नहीं होता, फिर भी बाद में खालीपन, बेचैनी या आत्मविश्वास में कमी महसूस होती है।
वहीं फोर्टिस अस्पताल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. दीक्षा अथवानी मानती हैं कि इसे किसी रहस्यमयी एनर्जी की बजाय हार्मोनल और इमोशनल बॉन्डिंग के रूप में समझना चाहिए।
आजादी का मतलब भावनाओं से भागना नहीं
सेक्शुअल लिबरेशन का मकसद डर और शर्म से आजादी था, लेकिन आज भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है। सोशल मीडिया पर थ्रिल, फ्लर्टिंग और एक्साइटमेंट तो दिखते हैं, लेकिन रात के 3 बजे का खालीपन कोई पोस्ट नहीं करता।
मुद्दा यह नहीं कि कैजुअल सेक्स सही है या गलत। सच्चाई यह है कि यह हर किसी के लिए इमोशनली न्यूट्रल नहीं होता।
असली आजादी क्या है?
अगर यह आपको सुकून देता है, तो ठीक है। अगर यह आपको उलझा और खाली छोड़ देता है, तो वह भी उतनी ही सच्ची हकीकत है। असली आजादी तब है, जब हम बिना शर्म और जजमेंट के अपनी फीलिंग्स को स्वीकार करें और वही चुनें जो हमें लंबे समय में संभाल सके—न कि सिर्फ वही, जो समाज या सोशल मीडिया में ट्रेंड कर रहा हो।




