शुगर कंट्रोल की दवा या रिस्क फैक्टर? टाइप-2 डायबिटीज पर स्टडी का बड़ा दावा
टाइप 2 डायबिटीज की आम दवाओं पर नई रिसर्च ने उठाए सवाल। University of Barcelona की स्टडी के मुताबिक, लंबे समय तक सल्फोनिल्यूरिया दवाओं के इस्तेमाल से बीटा कोशिकाओं की पहचान कमजोर हो सकती है।

डायबिटीज, जिसे आमतौर पर शुगर की बीमारी कहा जाता है, भारत समेत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। टाइप 2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही तरह से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। इंसुलिन का निर्माण अग्न्याशय की बीटा कोशिकाएं करती हैं, जो ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।
लेकिन अब University of Barcelona की एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला दावा सामने आया है। अध्ययन के मुताबिक, टाइप 2 डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए आमतौर पर दी जाने वाली एक श्रेणी की दवाएं लंबे समय में बीमारी को और गंभीर बना सकती हैं।
क्या कहती है रिसर्च?
यह स्टडी जर्नल Diabetes, Obesity and Metabolism में प्रकाशित हुई है। रिसर्च के अनुसार, टाइप 2 डायबिटीज के इलाज में सालों से सल्फोनिल्यूरिया कैटेगरी की दवाएं इस्तेमाल की जा रही हैं, जिनमें ग्लिबेनक्लामाइड एक आम दवा है।
स्टडी के लीड रिसर्चर प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या के मुताबिक, “ये दवाएं बीटा कोशिकाओं को ज्यादा इंसुलिन रिलीज करने के लिए स्टिम्युलेट करती हैं, जिससे शुरुआत में ब्लड शुगर कंट्रोल बेहतर दिखता है।”
बीटा कोशिकाएं मरती नहीं, पहचान खो देती हैं
रिसर्च में सामने आया है कि ग्लिबेनक्लामाइड जैसी दवाओं के लंबे इस्तेमाल से बीटा कोशिकाएं नष्ट नहीं होतीं, बल्कि वे अपनी पहचान खोने लगती हैं।
प्रोफेसर मोंटान्या के अनुसार, लंबे समय तक दवा के संपर्क में रहने से बीटा कोशिकाओं की जीन एक्टिविटी घटने लगती है, ये वही जीन होती हैं जो इंसुलिन उत्पादन के लिए जरूरी हैं, दवाएं कोशिकाओं के भीतर एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम में तनाव पैदा करती हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।
दवा का असर समय के साथ क्यों घट जाता है?
रिसर्च से यह भी समझ में आया कि शुरुआत में असरदार दिखने वाली ये दवाएं समय के साथ कम प्रभावी हो जाती हैं।
- बीटा कोशिकाओं की पहचान कमजोर होने लगती है,
- इंसुलिन उत्पादन घटता है,
- और ब्लड शुगर पर नियंत्रण धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।
- यही वजह है कि कई मरीजों को समय के साथ दवा की खुराक बढ़ानी पड़ती है या नई दवाएं जोड़नी पड़ती हैं।
राहत की बात: असर हो सकता है रिवर्स
रिसर्चर्स का कहना है कि बीटा कोशिकाओं की पहचान का खत्म होना स्थायी सेल डेथ जैसा नहीं है। सही इलाज और रणनीति से बीटा कोशिकाओं की पहचान और इंसुलिन बनाने की क्षमता दोबारा बहाल की जा सकती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद न करें। यह रिसर्च सिर्फ यह संकेत देती है कि लंबे समय तक सल्फोनिल्यूरिया दवाओं के इस्तेमाल से ब्लड शुगर कंट्रोल कमजोर हो सकता है। इसी कारण कई मरीजों को समय के साथ दवा की डोज बढ़ानी या इलाज में बदलाव करना पड़ता है।




