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सीधी बात, सख्त संदेश: अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा इस्लामी आतंकवाद

अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने कहा कि इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद अमेरिका व पश्चिमी सभ्यता के लिए बड़ा खतरा है। इंटरनेट के जरिए फैल रहे कट्टरपंथ और युवाओं के कट्टरपंथीकरण पर जताई चिंता।

वाशिंगटन. संयुक्त राज्य अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड ने इस्लामिक विचारधारा को लेकर कड़ी टिप्पणी की है। वार्षिक अमेरिका महोत्सव को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस्लामी आतंकवाद और इस्लामवादी उग्रवाद अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में शामिल हैं और यह पश्चिमी सभ्यता के लिए भी गंभीर चुनौती पेश करता है।

इंटरनेट के जरिए फैल रहा वैचारिक खतरा

अमेरिकी सार्वजनिक सूचना नेटवर्क सी-एसपीएएन (C-SPAN) की वेबसाइट पर उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, तुलसी गबार्ड ने 20 दिसंबर को महोत्सव को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि इस्लामी उग्रवाद अब इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से फैल रहा है, जिससे यह एक वैचारिक खतरे के रूप में उभर चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस चुनौती का सामना करने के लिए संगठित और दीर्घकालिक रणनीति जरूरी है।

युवाओं के कट्टरपंथीकरण पर चिंता

गबार्ड ने कहा कि युवाओं को कट्टरपंथी बनाया जा रहा है और इसका प्रभाव सामाजिक सौहार्द पर पड़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि क्रिसमस जैसे पर्वों के दौरान भी इस्लामी उग्रवाद का खौफ देखा जा रहा है।

उनके अनुसार, जर्मनी में क्रिसमस बाजार रद्द किए जा रहे हैं, जबकि अमेरिका के कुछ हिस्सों—मिशिगन, मिनियापोलिस और मिनेसोटा—में मौलवी खुलेआम इस विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं और युवाओं को प्रभावित कर रहे हैं।

शरिया कानून को लेकर किए गए दावे

तुलसी गबार्ड ने कहा, “इस साल की शुरुआत में इस्लामिक संगठनों की एक बैठक हुई थी, जिसमें अमेरिका के कई हिस्सों में शरिया कानून लागू करने की मांग की गई।” उन्होंने दावा किया कि ह्यूस्टन जैसी जगहों पर यह पहले से लागू है और यह अमेरिका की सीमाओं के भीतर मौजूद है।

उन्होंने पैटरसन, न्यू जर्सी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह शहर खुद को पहला मुस्लिम शहर बताने में गर्व महसूस करता है और कुछ समूह इस्लामी कानूनों को समाज पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर

अपने संबोधन के अंत में गबार्ड ने दोहराया कि अमेरिका को इस वैचारिक और सुरक्षा चुनौती को गंभीरता से लेना होगा। उनके अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए इस मुद्दे पर खुली चर्चा और ठोस कदम अनिवार्य हैं।

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