टोकाटाकी से भड़के राजनाथ सिंह, मुस्लिमों पर बयान के दौरान संसद में हुआ तीखा विवाद
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को संसद में वंदे मातरम् पर चर्चा में भाग लिया। उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् की रचना रामायण के श्लोक ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ से प्रेरित होकर की थी, जिसमें मातृभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताया गया है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को संसद में वंदे मातरम् पर चर्चा में भाग लिया। उन्होंने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् की रचना रामायण के श्लोक ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ से प्रेरित होकर की थी, जिसमें मातृभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताया गया है।
भाषण के दौरान जब उन्हें टोकने की कोशिश की गई तो वह काफी भड़क गए। राजनाथ सिंह कह रहे थे— “सच्चाई यह है कि भारतीय मुस्लिमों ने बंकिमचंद्र के भाव को…” इतना कहते ही सदन में कुछ सांसदों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। इस पर रक्षा मंत्री ने तीखे स्वर में कहा— “कौन बैठाने वाला है? कौन बैठाएगा? अध्यक्ष महोदय, इन्हें रोकिए। संसद में चाहे कोई कुछ भी बोले, शोर-शराबा नहीं होना चाहिए। आप बाद में खड़े होकर प्रतिकार कर सकते हैं। यही सदन की मर्यादा है और मैंने सदैव इसका पालन किया है।”
मुस्लिम समाज ने वंदे मातरम् के भाव को बेहतर समझा: राजनाथ सिंह इसके बाद राजनाथ सिंह ने अपनी अधूरी बात पूरी करते हुए कहा— “सच्चाई यह है कि भारतीय मुस्लिमों ने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के भाव को कांग्रेस या मुस्लिम लीग के नेताओं की तुलना में कहीं अधिक अच्छी तरह से समझा।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि वंदे मातरम् कोई राजनीतिक या सांप्रदायिक अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम की पुकार था। बाद में कट्टरपंथ और तुष्टिकरण की राजनीति ने इसे गलत रंग देने का प्रयास किया।
राजनाथ सिंह ने कहा कि आनंदमठ के पात्र भवानंद द्वारा गाए गए इस गीत में जन्मभूमि को ही जननी बताया गया है, जो बंकिमचंद्र की राष्ट्रजननी पूजा की परंपरा को दर्शाता है। यही कारण है कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय चेतना का सूत्र बना।
वंदे मातरम् के 150 वर्षों पर जोरदार चर्चा
वंदे मातरम् के 150 वर्षों पर आयोजित चर्चा के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा— “वंदे मातरम् केवल बंगाल तक सीमित नहीं था। यह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरे भारत में फैल गया। पंजाब, तमिलनाडु और बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लोग भी इसका जप करने लगे।”
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी यह एक मंत्र बन गया।
लंदन, पेरिस, जेनेवा और कनाडा जैसे देशों में रहने वाले भारतीय भी वंदे मातरम् का जाप करते रहे।
स्वतंत्रता आंदोलन को दी अद्भुत ऊर्जा
राजनाथ सिंह ने कहा— “वंदे मातरम् भारत के इतिहास, वर्तमान और भविष्य से जुड़ा हुआ है। इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों को अपार शक्ति दी। यही वह गीत था जिसने सदियों की गुलामी के बाद देश को झकझोर कर जगा दिया।” उन्होंने बताया कि वंदे मातरम् की गूंज आधी सदी तक स्वतंत्रता आंदोलन में गूंजती रही और इसकी आवाज ब्रिटिश संसद तक पहुंची।
ब्रिटिश सरकार ने लगाया था प्रतिबंध, फिर भी नहीं रुका जाप
राजनाथ सिंह ने बताया कि अप्रैल 1906 में ब्रिटिश सरकार ने वंदे मातरम् के सार्वजनिक जाप पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन लोगों ने इस आदेश का खुलेआम उल्लंघन किया।
उन्होंने कहा कि उस्मानिया विश्वविद्यालय में भी वंदे मातरम् के जप पर रोक लगाई गई थी। इस आदेश का विरोध करने पर छात्र श्री रामचंद्र को जेल भेज दिया गया था।




