कानून के दायरे में शक्ति: एमपी हाईकोर्ट का कड़ा रुख
पिस्टल की नोंक पर लूट जैसे गंभीर अपराध में आपसी समझौते के बावजूद हाईकोर्ट ने राहत से इनकार किया। जस्टिस बी पी शर्मा ने अपील खारिज की।

जबलपुर. आपसी समझौते का आवेदन ट्रायल कोर्ट द्वारा निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की एकलपीठ जस्टिस बी पी शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि कानून के तहत मिली शक्तियों का उपयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए, ताकि कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो और न्याय का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सके। अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता से समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए अपील को खारिज कर दिया गया।
इंदौर निवासी ने लगाई थी याचिका
इंदौर निवासी रोशन खातरकर की ओर से दायर याचिका में दलील दी गई थी कि भोपाल के मिसरोद थाना में शिकायतकर्ता शाहरुख खान ने उसके और एक सह-अभियुक्त के खिलाफ पिस्टल की नोंक पर कार और मोबाइल लूटने की शिकायत दर्ज कराई थी।
याचिका में कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझ चुका है और धारा 320(2) के तहत ट्रायल कोर्ट में आपसी समझौते के आधार पर आवेदन पेश किया गया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने अपराध को कंपाउंडेबल न मानते हुए आवेदन खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट की ‘अंदरूनी शक्तियां’ और उनकी सीमा
एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट की अंदरूनी (Inherent) शक्तियां बहुत व्यापक हैं, जिनका उद्देश्य न्याय का सही प्रशासन सुनिश्चित करना और न्यायिक त्रुटियों को सुधारना है।
कोर्ट ने कहा कि केवल यह आधार कि कोई अपराध कंपाउंडेबल नहीं है, हाईकोर्ट को अपनी शक्तियों के इस्तेमाल से स्वतः नहीं रोकता। इन शक्तियों का उपयोग उन मामलों में किया जा सकता है, जहां आरोपी के खिलाफ सजा की संभावना नहीं हो और पूरी ट्रायल प्रक्रिया व्यर्थ साबित होने वाली हो।
लेकिन हर मामले में नहीं मिलेगी राहत
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इन शक्तियों का प्रयोग बहुत सीमित और चुनिंदा मामलों में ही किया जाना चाहिए—जहां अभियोजन को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बनता हो।
मौजूदा प्रकरण में यह सामने आया कि दोनों पक्षों के बीच सटे हुए प्लॉट को लेकर सिविल विवाद की शुरुआत हुई थी, लेकिन आरोपों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और याचिका निरस्त कर दी।




