उत्तर प्रदेशराज्य

GST डिप्टी कमिश्नर के इस्तीफे की खबरें, सरकार के पास नहीं पहुंचा त्यागपत्र

GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह का सार्वजनिक इस्तीफा अब तक शासन को नहीं मिला। फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के आरोपों पर रिपोर्ट तलब, जांच तेज।

लखनऊ. अयोध्या में तैनात जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह द्वारा सार्वजनिक रूप से इस्तीफे का एलान किए जाने के बावजूद अब तक उनका त्यागपत्र न तो शासन स्तर पर पहुंचा है और न ही राज्य कर आयुक्त कार्यालय में इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि हो सकी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, जब तक लिखित रूप में इस्तीफा प्राप्त नहीं होता, तब तक आगे की किसी भी कार्रवाई पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।

प्रशांत कुमार सिंह ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में भावनात्मक बयान देते हुए पद छोड़ने की घोषणा की थी। इस एलान ने प्रशासनिक गलियारों के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी। हालांकि, उसी रात उनके बड़े भाई डॉ. विश्वजीत सिंह ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशांत ने फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल की और संभावित कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफे की घोषणा की। अब जब प्रशासनिक स्तर पर कोई औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है, तो पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े हो गए हैं।

राज्य कर आयुक्त से मांगी गई पूरी रिपोर्ट

मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन ने राज्य कर आयुक्त से प्रशांत कुमार सिंह से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। शासन ने निर्देश दिए हैं कि रिपोर्ट में उनके खिलाफ चल रही जांच, अब तक की गई विभागीय कार्रवाई, जारी नोटिस और आगे संभावित कदमों का पूरा विवरण शामिल किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि इस्तीफे की घोषणा किन परिस्थितियों में की गई और क्या इसका सीधा संबंध चल रही जांच से है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही शासन आगे की रणनीति तय करेगा।

फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से नौकरी पाने का दावा

विवाद की जड़ में डॉ. विश्वजीत सिंह द्वारा लगाए गए आरोप हैं। उनका कहना है कि प्रशांत कुमार सिंह ने कथित रूप से फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के आधार पर सरकारी नौकरी प्राप्त की। इस संबंध में उन्होंने विभागीय स्तर पर शिकायत दर्ज कराने के साथ मुख्यमंत्री कार्यालय को भी पत्र भेजा था।

डॉ. विश्वजीत के अनुसार, 20 अगस्त 2021 को उन्होंने औपचारिक रूप से दिव्यांग प्रमाणपत्र की जांच की मांग की थी। इसके बाद मंडलीय चिकित्सा परिषद ने दो बार प्रशांत को मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने के लिए बुलाया, लेकिन दोनों अवसरों पर वे पेश नहीं हुए। उनका तर्क है कि यदि प्रमाणपत्र वैध होता, तो जांच से बचने की जरूरत नहीं पड़ती।

सूत्रों के मुताबिक, मऊ से जुड़े इस प्रकरण में मुख्य चिकित्सा अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है, जिसे शासन को भेजा जाना है। यही रिपोर्ट तय करेगी कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई या नहीं।

बीमारी को लेकर उठे सवाल

डॉ. विश्वजीत सिंह ने यह भी दावा किया है कि जिस आंख की बीमारी के आधार पर दिव्यांग प्रमाणपत्र बनाया गया, वह चिकित्सकीय दृष्टि से 50 वर्ष की आयु से पहले अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। कम उम्र में इस आधार पर दिव्यांगता प्रमाणित होना संदेह पैदा करता है। उनका कहना है कि 2021 से अब तक प्रशांत को कम से कम तीन नोटिस जारी किए गए, लेकिन न तो वे व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और न ही कोई लिखित जवाब दिया।

राजनीतिक पृष्ठभूमि भी चर्चा में

प्रशांत कुमार सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। जानकारी के अनुसार, वे कभी वरिष्ठ नेता अमर सिंह की पार्टी ‘लोकमंच’ में जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। बाद में उन्होंने पीसीएस परीक्षा उत्तीर्ण कर सेल टैक्स विभाग में चयन पाया। हाल के दिनों में उनका एक पोस्टर भी वायरल हुआ है, जिसमें भगवा पृष्ठभूमि पर उनकी तस्वीर और अटल बिहारी वाजपेई की कविता अंकित है। सूत्रों का कहना है कि वे भाजपा से टिकट के दावेदार भी रहे हैं।

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