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न दिखे लक्षण, पर खतरा बड़ा: ग्लूकोमा से आंखों की रोशनी को है गंभीर जोखिम

ग्लूकोमा (काला मोतिया) एक साइलेंट बीमारी है जो बिना लक्षण आंखों की रोशनी छीन सकती है। जानिए इसके लक्षण, रिस्क फैक्टर्स और बचाव—विशेषज्ञ डॉ. पवन गुप्ता की सलाह।

ग्लूकोमा, जिसे आम भाषा में ‘काला मोतिया’ कहा जाता है, आंखों की एक गंभीर बीमारी है जो ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है। इसे ‘साइलेंट थीफ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि शुरुआती चरण में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। समय पर पहचान न होने पर यह स्थायी अंधेपन का कारण बन सकता है। इसी जागरूकता के लिए हर साल जनवरी को Glaucoma Awareness Month के रूप में मनाया जाता है।

इस विषय पर हमने डॉ. पवन गुप्ता (सीनियर कैटेरेक्ट एंड रेटिना सर्जन, आई 7 हॉस्पिटल, लाजपत नगर एवं विजन आई क्लीनिक, नई दिल्ली) से ग्लूकोमा के लक्षणों और रिस्क फैक्टर्स के बारे में जाना।

ग्लूकोमा के लक्षण कैसे होते हैं?

ग्लूकोमा की सबसे खतरनाक बात यह है कि अधिकतर मरीजों को तब तक पता नहीं चलता, जब तक दृष्टि काफी हद तक प्रभावित न हो जाए। लक्षणों को चरणों में समझा जा सकता है—

शुरुआती और मीडियम स्टेज

  • कोई स्पष्ट लक्षण नहीं: न दर्द, न अचानक नजर में बदलाव।
  • पेरिफेरल विजन में कमी: साइड का दिखना घटने लगता है; सामने साफ दिखता है, किनारे धुंधले/काले लगते हैं।
  • कंट्रास्ट में कमी: रंगों और परछाइयों में अंतर करना कठिन।
  • अंधेरा महसूस होना: आसपास रोशनी कम लगना।

एक्यूट स्टेज

जब आंखों का दबाव तेजी से बढ़ता है—

  • तेज आंख दर्द और लालिमा
  • सिरदर्द, जी मिचलाना
  • रोशनी के चारों ओर इंद्रधनुष जैसे घेरे
  • दृष्टि का अचानक धुंधलापन

एडवांस्ड स्टेज

  • टनल विजन: सिर्फ सामने का थोड़ा हिस्सा दिखना।
  • इलाज न मिलने पर पूरी रोशनी जाने का खतरा।

ग्लूकोमा के रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?

ग्लूकोमा किसी को भी हो सकता है, लेकिन निम्न स्थितियों में जोखिम अधिक रहता है—

  • पारिवारिक इतिहास: घर में किसी को ग्लूकोमा।
  • उम्र: 40 वर्ष से ऊपर।
  • आंखों की समस्याएं: हाई मायोपिया।
  • मेडिकल कंडीशंस: डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग।
  • स्टेरॉयड का लंबा उपयोग: आई ड्रॉप्स या दवाएं।
  • चोट/सर्जरी: आंखों की पुरानी चोट या बार-बार सर्जरी।

बचाव के लिए क्या करें?

ग्लूकोमा से हुआ नुकसान वापस नहीं आता, इसलिए जल्दी पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है।

40 की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार आंखों की जांच कराएं—

  • आई प्रेशर चेक
  • फंडस जांच
  • हाई-रिस्क समूह में हैं तो डॉक्टर की सलाह से अधिक बार जांच कराएं।

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