संयुक्त राष्ट्र की नई पहल, 15 तारीख को मनाया जाएगा पहला विश्व तुर्की भाषा परिवार दिवस
संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने समरकंद में आयोजित आम सभा के दौरान यह निर्णय लिया है कि हर वर्ष 15 दिसंबर को विश्व तुर्की भाषा परिवार दिवस मनाया जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र. संयुक्त राष्ट्र के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने समरकंद में आयोजित आम सभा के दौरान यह निर्णय लिया है कि हर वर्ष 15 दिसंबर को विश्व तुर्की भाषा परिवार दिवस मनाया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य तुर्की भाषा बोलने वाले समुदायों की साझा भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करना है, साथ ही बहुभाषावाद और सांस्कृतिक विविधता के प्रति यूनेस्को की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ करना है।
20 करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं तुर्की भाषाएं
तुर्की भाषा परिवार में अजरबैजानी, कजाख, किर्गिज, तुर्की, तुर्कमेन और उज्बेक समेत कई भाषाएं शामिल हैं। यह भाषा परिवार लगभग 1 करोड़ 20 लाख वर्ग किलोमीटर के विशाल भू-भाग में फैला हुआ है और इसे 20 करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं। इसी क्रम में सोमवार को इसे पहली बार मनाने की तैयारियां की जा रही हैं।
समृद्ध विरासत और जीवंत परंपराओं का प्रतीक
यूनेस्को के अनुसार, तुर्की भाषाओं में समृद्ध लिखित विरासत, मजबूत मौखिक परंपराएं और कई सदस्य देशों में फैली विविध सांस्कृतिक प्रथाएं समाहित हैं। यह भाषाएं यूरेशिया के विभिन्न समुदायों को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से जोड़ती हैं।
पांच देशों के संयुक्त अनुरोध पर लिया गया निर्णय
विश्व तुर्की भाषा परिवार दिवस की घोषणा अजरबैजान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्किये और उज्बेकिस्तान के संयुक्त अनुरोध पर की गई है। इस प्रस्ताव को यूनेस्को के 21 सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त हुआ।
15 दिसंबर का ऐतिहासिक महत्व
15 दिसंबर की तिथि को चुनने के पीछे भाषा विज्ञान के इतिहास का विशेष महत्व है। इसी दिन 1893 में डेनिश भाषाविद् विल्हेम थॉमसन ने घोषणा की थी कि उन्होंने ओरखोन शिलालेखों की वर्णमाला को समझ लिया है। ये शिलालेख तुर्की भाषा परिवार के सबसे पुराने ज्ञात लिखित अभिलेखों में से एक माने जाते हैं।
यूरेशिया को जोड़ने वाली भाषाई परंपरा
विल्हेम थॉमसन की इस ऐतिहासिक खोज ने तुर्की भाषा परिवार की उस भाषाई परंपरा को समझने का मार्ग प्रशस्त किया, जो आज भी यूरेशिया के दर्जनों समुदायों को आपस में जोड़ती है। यूनेस्को का यह निर्णय वैश्विक स्तर पर भाषाई विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।




