कलाओं की आत्मा जिंदा: विरासत संरक्षण में संस्थान की अनोखी भूमिका
लखनऊ: उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान द्वारा 500 से अधिक पारंपरिक जनजातीय आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण, प्रदर्शनी से नई पीढ़ी को सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ा जा रहा है।

लखनऊ. उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान प्रदेश की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संस्थान पारंपरिक आभूषणों और दुर्लभ बर्तनों के संरक्षण के माध्यम से जनजातीय परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहा है। यह पहल योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास की अवधारणा को साकार करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
500 से अधिक पारंपरिक आभूषणों व बर्तनों का संरक्षण
संस्थान द्वारा प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक तरीकों से बनाए गए 500 से अधिक आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण किया जा रहा है। प्रदर्शनी के माध्यम से इन कलाकृतियों को सार्वजनिक मंच प्रदान कर नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
जनजातीय परंपराओं और कला-कौशल की पहचान हैं आभूषण
उत्तर प्रदेश की थारू, बुक्सा, गोंड और बैगा जनजातियों के आभूषण केवल सौंदर्य के प्रतीक नहीं, बल्कि उनकी गहरी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं के सजीव प्रमाण हैं। संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी ने बताया कि ये आभूषण पूर्णतः हस्तनिर्मित होते हैं और सदियों पुराने शिल्प कौशल से तैयार किए जाते हैं। इनके निर्माण में गिलेट/गोटा चांदी, पुराने भारतीय सिक्के, मनके, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी और सीप जैसी सामग्रियों का उपयोग होता है।
पारंपरिक भट्टी में धातु को गर्म कर तार और चादरों में ढालने के बाद हाथों से अंतिम रूप दिया जाता है। हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी, हार, अंगूठियां, बाजूबंद और मंगलसूत्र जैसे आभूषण जनजातीय जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। संस्थान इनकी पारंपरिक पहचान बनाए रखते हुए आधुनिक डिज़ाइन के साथ जोड़ने का भी प्रयास कर रहा है, जिससे युवा पीढ़ी इन्हें एथनिक और वेस्टर्न पहनावे में भी अपनाती दिख रही है।
थारू, बुक्सा, अगरिया और खरवार जनजातियों के बर्तनों का भी संरक्षण
संस्थान का कार्य आभूषणों तक सीमित नहीं है। थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार तथा सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों के पीतल, तांबे और मिट्टी के पारंपरिक बर्तन भी संरक्षण के दायरे में हैं। इनमें धातु पात्र, मृदभांड और जंगली लौकी से बनी ‘तुंबी’ शामिल हैं, जो आज भी जनजातीय जीवनशैली को दर्शाते हैं।
अगरिया जनजाति प्राचीन धातुकर्म कला के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जबकि थारू जनजाति चावल से पेय बनाने के लिए ‘जाड़’ में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करती है। संस्थान समय-समय पर प्रदर्शनियों के जरिए इन कलाकृतियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है।
यूपी दिवस 2026 व जनजातीय भागीदारी महोत्सव में मिला मंच
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश दिवस–2026 और जनजातीय भागीदारी महोत्सव के अवसर पर जनजातीय शिल्पकारों को मंच और सम्मान प्रदान किया गया, जिससे जनजातीय गौरव को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।




