सूचना आयोग का स्पष्टीकरण—वैवाहिक निजी रिश्ते RTI के अंतर्गत नहीं
राज्य सूचना आयोग ने स्पष्ट किया कि आरटीआई अधिनियम का उपयोग निजी वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों की जांच के लिए नहीं किया जा सकता, यह पारदर्शिता का माध्यम है।

लखनऊ. सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे को स्पष्ट करते हुए राज्य सूचना आयुक्त मोहम्मद नदीम की पीठ ने अहम टिप्पणी की है। आयोग ने कहा कि आरटीआई का उपयोग निजी वैवाहिक संबंधों की जांच-पड़ताल के लिए नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी संतकबीर नगर की एक महिला द्वारा दायर अपील को निस्तारित करते हुए की गई।
पति के निजी वैवाहिक संबंधों पर मांगी गई थी जानकारी
अपीलकर्ता महिला ने पति से अलगाव के बाद ग्राम पंचायत के जन सूचना अधिकारी के समक्ष आरटीआई आवेदन दायर किया था। आवेदन में यह जानना चाहा गया था कि—
- क्या वह अपने पति के साथ विधिक पत्नी के रूप में रह रही है या नहीं
- ग्राम प्रधान को उसके पति के वैवाहिक संबंधों के बारे में क्या जानकारी है
- क्या पति ने पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी महिला को पत्नी के रूप में रखा है
- उससे उत्पन्न बच्चों के नाम व आयु क्या हैं
ग्राम पंचायत अभिलेखों में उपलब्ध नहीं ऐसी जानकारी
जन सूचना अधिकारी ने अपने उत्तर में स्पष्ट किया कि इस प्रकार की कोई भी जानकारी ग्राम पंचायत के अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है। इस उत्तर से असंतुष्ट होकर महिला ने राज्य सूचना आयोग में अपील दायर की।
आरटीआई निजी रिश्तों का ‘सामाजिक रजिस्टर’ नहीं
अपील पर सुनवाई करते हुए आयोग ने कहा कि ग्राम पंचायत से नागरिकों के निजी वैवाहिक जीवन, पारिवारिक विवादों या व्यक्तिगत संबंधों का रिकॉर्ड रखने की अपेक्षा करना आरटीआई अधिनियम की भावना का अनावश्यक विस्तार है।
आयुक्त ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा— “आरटीआई अधिनियम पारदर्शिता का माध्यम है, न कि स्त्री-पुरुष के निजी रिश्तों का सामाजिक रजिस्टर।”
जो अस्तित्व में ही नहीं, उसकी जानकारी उपलब्ध कराना संभव नहीं
आयोग ने कहा कि आरटीआई के प्रति नागरिकों का भरोसा बढ़ना सकारात्मक है, लेकिन यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि जन सूचना अधिकारी ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराए, जो किसी सार्वजनिक अभिलेख में अस्तित्व में ही नहीं हैं। पीठ ने यह मानते हुए कि जन सूचना अधिकारी द्वारा दिया गया उत्तर पर्याप्त है, अपील को निरस्त कर दिया।




