राजनीतिक संदेश स्पष्ट: शशि थरूर बोले—पार्टी के साथ था, हूं

नई दिल्ली. कांग्रेस में जारी अंतर्कलह के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए आलोचकों को स्पष्ट जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने संसद में कभी भी पार्टी लाइन का उल्लंघन नहीं किया और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनका रुख हमेशा देशहित को प्राथमिकता देने वाला रहा है। थरूर का यह बयान ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी के रुख से अलग नजर आता है, जिससे पार्टी के भीतर मतभेद और गहराने की संभावना जताई जा रही है।
केरल साहित्य महोत्सव में रखी बात
शनिवार, 24 जनवरी 2026 को केरल साहित्य महोत्सव के दौरान कोझिकोड में आयोजित एक संवाद सत्र में शशि थरूर ने कहा कि सार्वजनिक रूप से उन्होंने केवल ऑपरेशन सिंदूर के मुद्दे पर सैद्धांतिक असहमति जताई थी और उन्हें अपने उस रुख पर कोई पछतावा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संसद के भीतर उन्होंने हमेशा पार्टी के आधिकारिक रुख का पालन किया है और किसी भी मंच पर अनुशासन का उल्लंघन नहीं किया।
नेतृत्व से मतभेद की अटकलें
थरूर का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके कथित मतभेदों को लेकर चर्चाएं तेज रही हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोच्चि में हाल ही में हुए एक कार्यक्रम के दौरान जब राहुल गांधी ने मंच से नेताओं के नाम लिए, उस सूची में थरूर का नाम न आने से वे आहत बताए गए। इसके अलावा, केरल में कुछ नेताओं द्वारा उन्हें हाशिए पर रखने के प्रयासों की बातें भी सामने आती रही हैं।
जिम्मेदारी से अपनी राय रखने का दावा
इन अटकलों पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि बतौर सांसद और लेखक उन्होंने हमेशा जिम्मेदारी और संतुलन के साथ अपनी राय रखी है।
उन्होंने बताया कि पहलगाम की घटना के बाद उन्होंने एक अखबार में लेख लिखकर कहा था कि आतंकवादी घटनाओं को बिना जवाब के नहीं छोड़ा जाना चाहिए और आतंकवादी ढांचों के खिलाफ सीमित लेकिन निर्णायक कार्रवाई आवश्यक है।
पाकिस्तान से युद्ध नहीं, सीमित कार्रवाई का समर्थन
थरूर ने स्पष्ट किया कि उनका मानना था कि भारत विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है और उसे पाकिस्तान के साथ किसी लंबे सैन्य संघर्ष में नहीं उलझना चाहिए। हालांकि, आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने जैसी सीमित कार्रवाई को उन्होंने उचित ठहराया।
उन्होंने कहा कि उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि केंद्र सरकार ने लगभग वही कदम उठाए, जिनकी उन्होंने सिफारिश की थी।
‘अगर भारत नहीं रहेगा तो कौन बचेगा?’
राष्ट्रीय सुरक्षा पर जोर देते हुए थरूर ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध कथन का हवाला दिया— “अगर भारत नहीं रहेगा तो कौन बचेगा?”
उन्होंने कहा कि जब देश की सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा का सवाल हो, तब राजनीति को पीछे छोड़कर देश को सर्वोपरि रखना चाहिए। मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राष्ट्रीय हितों पर सभी दलों को एकजुट होना चाहिए।
क्यों अहम है थरूर का बयान?
कांग्रेस के भीतर उनके कथित मतभेदों पर चल रही चर्चाओं के बीच थरूर का यह बयान पार्टी नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है। यह दर्शाता है कि वे संगठन में रहते हुए भी स्वतंत्र विचार रखने से पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर उनकी प्राथमिकता हमेशा देश ही रहेगी। ऐसे समय में जब कांग्रेस आंतरिक एकजुटता और रणनीतिक दिशा को लेकर चुनौतियों का सामना कर रही है, थरूर का रुख पार्टी के भीतर विचार-विमर्श और बहस की संस्कृति को रेखांकित करता है।




